सहज पवित्र, सहज सुखधाम, ज्ञाता रूप परम अभिराम | sahaja pavitra sahaja sukhadhama j nata rupa parama abhirama

सहज पवित्र, सहज सुखधाम, ज्ञाता रूप परम अभिराम ।

ध्याऊँ पाप विनाशन हार, मंगलमय मंगल दातार ।।
जासों होय कर्म की हानि ।। 1।।

अपराजित शुद्धात्म स्वरूप, सर्व विभाव रहित ध्रुव रूप।
अकृत्रिम मंगल पहिचान, जाके आश्रय होय कल्याण।।
अद्भुत महिमामयी गुणखान।। 2।।

अनेकांतमय वस्तु स्वरूप, धर्म अनंतमयी चिद्रूप।
दर्श-ज्ञान-सुख-वीर्य अनंत, अनुभव माँहि प्रत्यक्ष लखंत ।।
जासों होय आनंद महान्।। 3।।

परम ब्रह्म परमात्म स्वरूप, परम ज्योति परमेष्ठी रूप।
स्वयं सिद्ध रत्नत्रय खान, नित्य निरंजन प्रभुतावान।।
शाश्वत परमात्म पहिचान।। 4।।

सहज मुक्त प्रभु परमादेय, अन्य भाव सब जाने हेय।
शुद्ध जीवास्तिकाय अम्लान, जन्मभूमि मुक्ति की जान ।।
तहँ पाऊँ अनंत विश्राम।। 5।।

निरन्तराय निर्विघ्न स्वरूप, नित जयवंत सहज चिद्रूप।
परम पारिणामिक अविकार, समयसार हो जग में सार ।।
जासों मिले परम शिवथान।। 6।।

कथन माँहि आवे न लगार, चिंतन भी नहीं पावे पार।
फिर भी स्तुति करूँ ललाम, हुआ भक्तिवश सहज प्रमाण ।।
जासों भाव विशुद्धि जान।। 7।।

परम पुराण पुरुष परमेश, ज्ञाता रूप सहज सर्वेश।
जय-जय चिदानंद चिद्रूप, प्रंशसनीय जग मंगल रूप ।।
स्वस्ति दायक जग में जान।। 8 ।।

ज्ञायक सहज चतुष्टयवान, चित्प्रकाशमय ध्रुव भगवान्।
पाप-पुण्य भावों से दूर, जामें उछले समता पूर।।
पायो आज भेद-विज्ञान।। 9।।

पर भावों की रही न चाह, पाई साँची मुक्ति राह।
सहज मुक्त हूँ है श्रद्धान, वर्ते निशदिन ये ही ध्यान।।
प्रगटे प्रभु सम ही मोक्ष महान् ।। 10 ।।

सर्व जगत् को स्वस्ति रूप, श्री जिन पूजा होय अनूप।
साक्षीभूत अहो जिननाथ, ध्याऊँ प्रभुतामय निजनाथ।।
निजनाथ है जिनवर समान।। 11।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३२८ से ३२९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’