स्वर (अ से औ, ॐ)
कुल 364 भजन
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अ (143)
- अ र र र र र र र र र र
- अंतर में सिद्धों की महिमा समाई
- अंतरंग प्रीति से सुनना, अहो ! भव्यजन जिनवाणी
- अंतर्मन पुलकित हुआ
- अकर्त्ता ज्ञातारूप अहो, आत्मा ज्ञातारूप अहो
- अखिल विश्व में कोई न मेरा, मेरा है एक आत्मा
- अखिल विश्व में मुझको, केवल आत्म स्वरूप दिखाय रे
- अजित जिन विनती हमारी मान जी
- अजित जिनेश्वर अघहरणं, अघहरणं अशरन-शरणं
- अजितनाथसों मन लावो रे
- अज्ञानी पाप धतूरा न बोय
- अज्ञानी प्राणी से कहें गुरु ज्ञानी
- अज्ञानीजन ! समझत क्यों नहिं वानी
- अति अद्भुत प्रतिमा देख प्रभो, आनन्द हृदय में छाया है
- अति संक्लेश विशुद्ध शुद्ध पुनि
- अद्भुत ऐ बात चली
- अद्भुत छवि जिनराज की
- अद्भुत प्रभुता आज निहारी
- अद्भुत प्रभुता वाले हैं
- अद्भुत प्रभुता शुद्धातम की, शुद्धातम की, परमातम की
- अद्भुत शान्त दशा निरखत ही, शीश झुके स्वयमेव
- अद्भुत से भरी अद्भुत प्यारा
- अनन्त चतुष्टयवंत हुये
- अनारी जिया तुझको यह भी खबर है
- अनाहारी भगवान् शुद्ध आत्मा
- अनुपम शाश्वत शुद्धातम
- अनेकांतमय वस्तु स्वरूप, स्याद्वादमय श्री जिनवाणी
- अन्तर आनन्द के रसिया
- अन्तर में उछले अवबोध सिन्धु
- अन्तर में प्रत्यक्ष निहार, तेरा प्रभु तुझमें विराजे
- अन्तर/अंतर में आनन्द आयो
- अन्तरयामी जिनराज, जय जय तारण तरण जिहाज
- अन्तर्दृष्टि की प्रेरणा
- अन्तर्मुखी हो प्रभुवर जिन भावना मैं भाऊँ
- अन्याय अनीति छोड़ा
- अपना करना हो कल्याण
- अपना कोई नहीं है रे जगत का झूँठा है व्यवहार
- अपना जीवन सफल करेगें
- अपना ज्ञायक भगवान्, मैं सर्वोत्तम पहिचाना
- अपना ज्ञायक रूप निहार, अपना ज्ञायक रूप निहार
- अपना ही रंग मोहे
- अपनी मंजिल मोक्ष है
- अपनी शक्ति सम्हार, करलो निज उपकार, गुरु उचारो
- अपनी सुधि पाय आप
- अपनी सुधि भूल आप
- अपने घर को देख बावरे
- अपने चेतन का सुध्यान धरूँगा
- अपने में अपना परमातम
- अपनो जानके तारो स्वामी मोहे
- अपनो शुद्धातम भगवान
- अपनो शुद्धातम भगवान् सहज ही जाननहारा है
- अब अघ करत लजाय रे भाई
- अब के जनम अरिहन्तों का सुमिरण
- अब गतियों में नाहीं रुलेंगे
- अब घर आये चेतनराय, सजनी खेलौंगी मैं होरी
- अब जिनदीक्षा लेना चाहिए - लौकांतिक देव
- अब तो ऋषभनाथ लौ लागी (कवि राजमल पवैया)
- अब तो ज्ञाता-दृष्टा रहना
- अब नित नेमि नाम भजौ
- अब निहारें अरे ! आत्म अन्तर को हम
- अब निहारो अहो! अपनी ज्ञायक छवि
- अब पूरी कर नींदड़ी
- अब प्रभु चरण छोड़ कित जाऊँ
- अब मन मेरे वे!, सुनि सुनि सीख सयानी
- अब मेरे समकित सावन
- अब मैं मम मंदिर में रहूंगा
- अब मोहि जानि परी, भवोदधि तारनको है जैन
- अब मोहि तार लेहु महावीर
- अब मोहि तार लै शांति जिनंद
- अब मोहि तारि लै नेमिकुमार
- अब मोहे तार लेहु महावीर
- अब विषयों में नाहीं रमेंगे
- अब समझ कही
- अब हम अमर भये
- अब हम आतम को पहचाना
- अब हम आतम को पहिचान्यौ
- अब हम सहज भये न रुलेंगे
- अबके ऐसी दिवाली मनाऊँ
- अभिनंदन-वंदन होऽऽऽ
- अभिशापों में वरदानों के स्वर्णिम
- अभी-अभी मेरे मन में ये
- अमृत झरता रे ज्ञायक भाव में
- अमृत पान करूँ अपने ही अंतर में, तृप्त सदैव रहूँ अपने ही अंतर में
- अमृत से गगरी भरो
- अय महावीर जमाने में हितंकर तू है
- अरहंत भक्ति
- अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय
- अरहंत सिद्ध साधु जैन
- अरहंत सिद्धों को वन्दन मेरा ( चौबीसी वन्दना )
- अरहंत सुमर मन बावरे
- अरिरजरहस हनन प्रभु
- अरिहंत जय जय
- अरे उड़ चला हंस सैलानी
- अरे ओ! शिखर सम्मेद अचल
- अरे चेतन समझत नाहीं, कोलग कहूँ समझाय
- अरे जिया जग धोखे की टाटी
- अरे जिया बिसरत
- अरे निज बतियाँ क्यों नहीं जानै
- अरे मन चल रे, श्रीहथनापुर की जात
- अरे मन बनिया बान न छोड़े
- अरे यह क्या किया नादान तेरी क्या समझपे पड़ गई धूल
- अरे ! हाँ चेतो रे भाई
- अरे हाँ रे तैं तो सुधरी बहुत बिगारी
- अरे हो अज्ञानी तूने कठिन मनुषभव पायो
- अरे हो जियरा धर्म में चित्त लगाय रे
- अर्हन् जिनेन्द्र भगवान्, तुम विश्व विजय पाई
- अलौकिकवृत्ति
- अवसर आया सुहाना
- अवसर आया है सुखदाय, ज्ञायक भाव भजो हर्षाय
- अविकारी शुद्ध स्वरूप प्रभो
- अविनाशी आत्म महल चैतन्य प्रकाशमयी
- अशरण जग में चन्द्रनाथ जिन
- अशरीरी सिद्ध भगवान्
- अस्मि भावना , चैतन्य चारु चिन्त्य चित्त चैन चुनूँगा
- अहिंसा के पथ पर जाऊँगा
- अहो ! अहो आराधूँ भगवन्, समयसार अविकार मैं
- अहो ! अहो ! जिननाथ, आपकी
- अहो ! अहो ! जिनवाणी माता, सहज समागम पाया है
- अहो ! अहो ! श्री चन्द्रप्रभो ! हम शरणे आए
- अहो चैतन्य आनंदमय
- अहो जिनधर्म मंगलमय, अहो जिनधर्म लोकोत्तम
- अहो ! जिनराज दर्शन से, मुक्ति का मार्ग मिलता है
- अहो ! जिनराज मेरे ज्ञान में हैं आये
- अहो जिनरूप मनहारी, अहो चिद्रूप अविकारी
- अहो ! जिनेश्वर तुम ही मेरे साँचे तारणहार हो
- अहो.. जिनेश्वर सांचे ईश्वर
- अहो ! जिनेश्वर हमें आपका दर्शन भाता है
- अहो जिनेश्वर ! हे परमेश्वर ! परम शरण सुखकार तुम्हीं
- अहो झूलते प्रशम भाव में, देखो ज्ञानी संत रे
- अहो ! दशलक्षण धर्म महान्’
- अहो दोऊ रंग भरे खेलत होरी
- अहो नमि जिनप नित नमत शत सुरप
- अहो! निज अनुभव ही सुखकार
- अहो ! निर्ग्रन्थ गुरुवर का दर्श साक्षात् कब होवे
- अहो ! परम उपकार जिनेश्वर, अहो ! परम उपकार रे
- अहो! परमामृत बरसावे, सहज ज्ञानामृत बरसावे
- अहो ! प्रभु ध्यान की मुद्रा, परम आनन्ददाता है
- अहो बनवासी पिया तुम क्यों छारी अरज करै राजुल नारी
- अहो भगवंत का दर्शन परम आनंद दाता है
- अहो ! भाग्य है मेरा, मैं जिनवर दर्शन पाया
- अहो यह उपदेशमाहीं
- अहो विदेहीनाथ ! दर्श कर, आनंद उर छाया
- अहो ! स्वाश्रय से हो पुरुषार्थ
आ (147)
- आ जा रे ! आ जा रे ! निज स्वभाव में आ जा
- आई आई देखो आई
- आई मंगल घड़ी आई
- आएँगे जब परमात्मा
- आओ आओ मिलकर आओ, जिनमंदिर में आज रे
- आओ आओ रे सभी मिल आओ, श्री जिनमंदिर में
- आओ जिनमंदिर में आओ
- आओ जिनमन्दिर में आओ
- आओ जी जिनदर्शन को, आओ जी जिन पूजन को
- आओ झूले मेरे चेतन
- आओ नी आओ नी भविजन
- आओ पधारो मम हृदयंगम
- आओ प्रभु की शरण में आओ
- आओ भवि जिनवर की भक्ति करेंगे, भक्ति करेंगे, वाणी सुनेंगे
- आओ भविजन आओ-आओ मुक्तिमार्ग में आओ
- आओ भाई मंगलमय निज शुद्धातम को ध्यायें
- आओ रे आओ रे ज्ञानानंद
- आओ हम सब मिल आज, जिनवर भक्ति करें
- आओ-आओ जिनवर की शरण में
- आओ-आओ प्रभु गुण गायें, प्रभुभक्ति कर शिवपथ पायें
- आओ-आओ महावीर, मुक्तिमार्ग दिखाओ
- आओ-आओ हो जिनालय आओ, प्रभु दर्शन पाओ
- आकुल रहित होय इमि
- आकुलरहित होय इमि निशदिन
- आगैं कहा करसी भैया, आजासी जब काल रे
- आचार्य उमास्वामी श्री, भारत में फिर आओ
- आचार्य कुंदकुंद जो
- आचार्य कुंदकुंद जो भारत में न आते
- आचार्य कुंदकुंद जो मारग न दिखाते
- आचार्य कुंदकुंद श्री भारत में फिर आओ
- आचार्य कुन्दकुन्द हैं आदर्श हमारे
- आचार्य भक्ति
- आचार्य श्री धरसेन जो न ग्रन्थ लिखाते
- आज अगर महावीर न होते
- आज आदीश्वर जन्मे हैं
- आज का दिवस है मंगलकारी, आज का दिवस है आनंदकारी
- आज का दिवस है मंगलकारी, आज का दिवस है आनन्दकारी
- आज का दिवस है मंगलकारी, मंगलकारी-आनंदकारी
- आज गिरराज निहारा, धन्य है भाग्य हमारा
- आज गिरिराज के शिखर सुन्दर सखी
- आज गिरिराज निहारा, धनभाग हमारा
- आज जन्मे हैं तीर्थंकर इस भरत क्षेत्र
- आज जिनदर्शन से, पायो विश्राम है
- आज तो बधाई राजा नाभि के दरबार में
- आज तो बधाई शान्तिनाथ के दरबार जी
- आज नगरी में जन्मे आदिनाथ
- आज माझ्या विराचे गुण कसे गाऊ बाई
- आज मेरे प्रगट्यो है आनन्द अनंत
- आज मैं धन्य हुई
- आज मैं परम पदारथ
- आज मैं महावीर जी
- आज समाज में देखो ये क्या हो रहा? Aaj samaj me dekho
- आज सी सुहानी सु
- आज हम जिनराज तुम्हारी
- आज हम जिनराज तुम्हारे
- आज हम मंगल कारज है कीना
- आज हमारो रंग केशरिया
- आजा अपने धर्म की तू राह में
- आतम अनुभव आवै जब निज
- आतम अनुभव करना रे भाई
- आतम अनुभव करना रे भाई ! निज का अनुभव करना रे
- आतम अनुभव कीजै हो
- आतम अनुभव सार हो
- आतम काज सँवारिये
- आतम जान, जान रे जान
- आतम जाना, मैं जाना ज्ञानसरूप
- आतम जानो रे भाई!
- आतम महबूब यार
- आतम रूप अनुपम अद्भुत
- आतम रूप अनुभवें मुनिवर
- आतमरूप अनूपम है
- आतमरूप सुहावना
- आत्म अनुभव का अवसर मिला
- आत्म अनुभव नित रमण
- आत्म चिन्तन का ये समय
- आत्म ज्ञानी (कवि राजमल पवैया)
- आत्म-ज्ञान की गाथा
- आत्मन् अब निज की ओर लखो, परमानंद पाओ अंतर में
- आत्मन् ! दुश्चिंतन नहीं करो, सम्यक् चिंतन ही सदा करो
- आत्मन्! रहो सदा अविकार
- आत्मन् हृदय के पट खोल, अब तो वीर प्रभु जय बोल
- आत्म-पुरुषार्थ
- आत्मा अजर अमर है
- आत्मा अनंत गुणों का धनी
- आत्मा में लीन रहूँ सदा
- आत्मा सदाकाल निरोग
- आत्मा स्वतंत्र है, सत्ता स्वतंत्र है, स्वरूप स्वतंत्र है, परिणमन स्वतंत्र है
- आत्मा ही समयसार
- आत्मा हूँ आत्मा हूँ आत्मा
- आदम जन्म खोया तैं नाहक खटका रह जायगा
- आदि जिनन्दा-२ आदि जिनन्दा-२
- आदिपुरुष मेरी आस भरो जी
- आदिप्रभु का, वीरप्रभु का
- आदीश्वर जिनराज, आज मैंने सपने में देखे
- आदीश्वर स्वामी वंदूँ मैं बारंबार
- आनंद अंतर मा आज न समाये
- आनंद छाया रे, सिद्धचक्र के पाठ में
- आनंद ताण्डव
- आनंद भयो - १६ सपनो का फल
- आनंद मंगल आज हमारे
- आनंद स्रोत बह रहा
- आनंदमय सागर उछले
- आनन्द अवसर आज, सुरगण आये
- आनन्द अवसर आयो, मुनिवर दर्शन पायो
- आनन्द की गगरी छलक
- आनन्द रूप सहज चित्स्वरूपं
- आनन्द/आनंद का दिन आयेगा-आयेगा
- आप कहा जैसा प्रभु, वैसा ही दिखलाय
- आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ
- आपमें जबतक कि कोई आपको पाता नहीं
- आपा नहिं जाना तूने
- आपा प्रभु जाना मैं जाना
- आप्त आगम गुरुवर
- आया अवसर भव्य समझ लो, जिन-आगम का सार
- आया कहाँ से, कहाँ है जाना
- आया जन्मकल्याणक महान्, हिल मिल नृत्य करो
- आया पंच कल्याणक महान
- आया पंचकल्याणक महान
- आया रे अवसर महान्, आओ जिनवाणी सुनें
- आया रे बुढ़ापो मानी
- आया शरण में तेरी हे आदिनाथ स्वामी
- आया है अवसर भक्ति करेंगे
- आया है अवसर समझो स्वयं को
- आया है सारा सिद्धालय, ज्ञान में मेरे
- आया-आया रे आनन्द का प्रसंग
- आयु रही अब थोड़ी कहा करै मोरी मोरी
- आये आये रे जिनन्दा
- आये तेरे द्वार सुन ले भक्तों की पुकार
- आये प्रभुवर शरण तुम्हारी
- आये श्रद्धा में भगवान् आज मैं धन्य हुआ
- आयेंगे हम आयेंगे, प्रभु दर्शन को आयेंगे
- आयो आयो पंचकल्याणक भविजन आ जाओ
- आयो आयो रे हमारो
- आयो प्रभुवर शरण तिहारी
- आयो-आयो रे! अठाई पर्व
- आयो-आयो रे हमारो स्वकाल
- आरति श्रीजिनराज तिहारी, करमदलन संतन हितकारी
- आरती आदि जिनिंद तुम्हारी, नाभिकुमार कनक-छविधारी
- आरती श्री चन्द्रप्रभु
- आरती श्री चांदनपुर महावीर स्वामी
- आरती श्री वर्द्धमान (कविवर द्यानतराय)
- आरसी देखत मन आर-सी लागी
- आर्हत्-वंदना
- आवे अहो ! निर्ग्रन्थ दशा, धन्य घड़ी कब होगी प्रभो
- आवे गुरुवर याद तुम्हारी, आवे मुनिवर याद तुम्हारी
- आवै न भोगनमें तोहि गिलान
- आश्रय योग्य उपादेय जानो, केवल शुद्धातम
इ (13)
- इक योगी असन बनावे
- इक्षु रस का किया पारणा
- इतनी शक्ति हमें देना माता
- इतिहासों की स्वर्णभूमि
- इन विभावों से दूर
- इन्द्र नाचे तेरी भक्ति में
- इष्ट प्रार्थना (भावना दिन रात मेरी)
- इस काल में सदा ही जैन संत रहेंगे
- इस जीवको, यों समझाऊं री
- इस दुखमा पंचमकाल में, गुरु अमृत बरसायो
- इस नगरी में किस विधि रहना
- इस विधि कीने करम चकचूर-सो विधि बतलाऊँ तेरा
- इसी लिए प्रभु रख लिए तुमने हाथों पे हाथ
उ (10)
- उजरो पथ है शिव ओरी को
- उठे सब के कदम
- उठो रे सुज्ञानी जीव
- उड़ उड़ रे म्हारी ज्ञान चुनरियाँ
- उड़े गगन में झण्डा प्यारा
- उत्तम क्षमा
- उत्तम नरभव पायकै, मति भूलै रे रामा
- उत्तम ब्रह्मचर्यमय जीवन - ब्र. श्री रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
- उपकार जिनवर आपका है अहो ! परमानंदमय
- उरग-सुरग-नरईश शीस जिस, आतपत्र त्रिधरे
ऊ (5)
- ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला
- ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला है, ये तीरथ हमारा
- ऊंचे ऊंचे शिखरों वाला
- ऊंचे ऊंचे शिखरों वाला रे
- ऊंचे शिखरों पे बसा है
ऋ (2)
ए (7)
- ए मान ये मन कीजिये भज प्रभु तज सब बात हो
- ए मेरे मीत! निचीत कहा सोवै
- ए री सखी आओ जी
- ए रे वीर रामजीसों कहियो बात
- एक तुम्हीं आधार हो जग में
- एका सिंहापुढे दोन मुनि बैसले
- एजी मोहि तारिये शान्तिजिनंद
ऐ (17)
- ऐ आतम है तुझको नमन
- ऐसा दो वरदान जिनेश्वर
- ऐसा ध्यान लगावो
- ऐसा मोही क्यों न अधोगति जावै
- ऐसा योगी क्यों न अभयपद पावै
- ऐसी चोसर जो नर खेलै सोही चतुर खिलाड़ी
- ऐसी प्रभुता देखी निज में, जाकी उपमा नहीं है जग में
- ऐसी समझ के सिर धूल
- ऐसे जैनी मुनि महाराज
- ऐसे मुनिवर देखे वन में
- ऐसे मुनिवर देखे वन में
- ऐसे विमल भाव जब पावै
- ऐसे साधु सुगुरु कब
- ऐसो ज्ञानी क्यों न महासुख पावे
- ऐसो नर भव पाय गंवायो, हे गंवायो अरे तू
- ऐसो मोही क्यों ना महादुख पावे
- ऐसो श्रावक कुल तुम पाय
ओ (10)
- ओ चिन्मय !
- ओ जगत् के शांतिदाता
- ओ जीवड़ा तू थारी
- ओ जैनी वीरों
- ओ मेरे मन, जिनवाणी सुन
- ओम् जय केवलज्ञानी, प्रभु जय केवलज्ञानी
- ओम् जय महावीर प्रभो, स्वामी जय महावीर प्रभो
- ओम् जय-जय अविकारी, स्वामी जय-जय अविकारी
- ओम्-ओम् जपेगा, ओम्-ओम् बोलेगा
- ओह रे आज मिली
औ (6)
- और अबै न कुदेव सुहावै
- और ठौर क्यों हेरत प्यारा
- और सब थोथी बातैं, भज ले श्रीभगवान
- और सब मिलि होरि रचावैं
- और सबै जग द्वन्द मिटावो I Aur Sabai Jag Dwand Mitavo
- और सबै जगद्वन्द मिटावो