तर्ज : ऐसे मुनिवर देखे…
ऐसी प्रभुता देखी निज में, जाकी उपमा नहीं है जग में। ।टेक ।।
रागादिक विकार पुद्गलमय, भासें नहीं ज्ञायक में।
भासे ज्ञेयाकार मलिनता, तदपि न हो ज्ञायक में ।।1।।
ज्ञानानन्द सागर उछलावे, अक्षुण्ण शुद्धातम में।
जानूँ जाननहार सहज ही, जानननहार ही हूँ मैं। ।2।।
अकृत्रिम भगवान् आत्मा, अपने ही अन्तर में।
क्षण-क्षण भाऊँ क्षण-क्षण ध्याऊँ, मग्न रहूँ आनन्द में ।।3।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’