ऐसो मोही क्यों ना महादुख पावे | aiso mohi kyom na mahadukha pave

ऐसो मोही क्यों ना महादुख पावे ।

निज स्वभाव पहिचान न जाके, पर की महिमा आवे ।। टेक ।।

प्रभु सी प्रभुता का स्वामी हो, दीन भयो भरमावे,
प्राप्त परिणति में तन्मय हो, पर में ममत्व धरावे।
निजानन्द रस स्वाद ना मोचा, अक्ष विषय मन भावे,
तिनही में नित उद्यम करता, नरभव व्यर्थ गँवावे ।। 1 ।।

पुण्योदय में फिरे भटकता, पाप उदय अटकावे,
पुण्य-पाप तें रहित ज्ञानमय, निज स्वभाव विसरावे।
लीन भयो व्यवहार माँहि, नहिं निश्चय दृष्टि सुहावे,
राग भाव में धर्म मानकर, निज पद नाहीं ध्यावे ।। 2 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’