आप कहा जैसा प्रभु, वैसा ही दिखलाय
आप कहा जैसा प्रभु, वैसा ही दिखलाय ।
धन्य हुआ कृतकृत्य हुआ, निज स्वरूप को पाय ।।1।।
नहीं प्रयोजन जगत् से, भासा सर्व असार ।
प्रगटे अब निर्ग्रन्थता, भाव यही अविकार ।।2।।
अस्थिरता का दोष प्रभु, उपजें राग अरु द्वेष ।
पर इनमें स्वामित्व मय, रहा नहीं लवलेश ।।3।।
फिर भी होवे खेद प्रभु, धन्य दशा प्रगटाय ।
ऐसी थिरता नाथ हो, विकल्प मात्र नहिं आय ।।4।।
धन्य-धन्य वीतरागता, धन्य-धन्य शुद्धात्म ।
धन्य-धन्य प्रभु आप हो, प्रगट्यो पद परमात्म ।।5।।
आवागमन विमुक्त हो, मैं भी तुम ढिंग आय ।
प्रभुतामय शिवरूप हो, काल अनन्त रहाय ।।6।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ८३