आ जा रे ! आ जा रे !! निज स्वभाव में आ जा।
पर में ना भरमाना रे ।। टेक ।।
मात-पिता-भ्रात-सुत-पत्नी सब स्वारथ की प्रीति रे।
मरण समय कोई साथ न देगा, यही जगत की रीति रे ।।
चेतो रे ! चेतो रे !! चेतन अब तो चेतो, पर का आश्रय छोड़ो रे ।। 1 ।।
अज्ञानी बनकर मत डोलो, ज्ञान तो तेरा स्वभाव रे।
पुद्गल में ना अटको-भटको, स्व आतम को ध्याओ रे ।।
यही है रे यही है समय का सार, चेतन स्व समय में आजा रे ।। 2 ।।
बीत गयी सो बीत गयी, तू उसे ध्यान में ना ले रे।
होना है सो होके रहेगा, तेरे व्यर्थ विकल्प रे।।
तजना रे झूठे सर्व विकल्पों को, तजना ज्ञाता-दृष्टा रहना रे ।। 3 ।।
जीव और पुद्गल में भैया, है अत्यन्ताभाव रे।
अलग-अलग सबके गुण-पर्यय, कोई किसी रूप ना हो रे ।।
रहते हैं सब अपने-अपने में स्थित, पर को तज निज भजना रे ।। 4 ।।
शब्द-रूप-रस-गंध रहित है, जीव चेतना मात्र रे।
अलिंग ग्रहण इन्द्रिय-अगोचर, स्वानुभूति के गम्य रे ।।
वह तो कोई अमूल्य निधि है, कर पुरुषारथ पाना रे।। 5 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’