ऐसो नर भव पाय गंवायो, हे गंवायो अरे तू
(राग काफी होरी)
ऐसो नर भव पाय गंवायो, हे गंवायो अरे तू. ॥टेर ॥
धनकूं पाय दान नहिं दीनो, चारित चित नहिं लायो ।
श्री जिनदेव की सेव न कीनी, मानुष जन्म लजायो,
जगत में आयो न आयो ॥१॥
विषय कषाय बढ़ो प्रति दिन दिन, आतम बल सु घटायो ।
तजि सतसंग भयो तू कुसंगी, मोक्ष कपाट लगायो,
नरक को राज कमायो ॥२॥
रजक श्वान सम फिरत निरंकुश, मानत नाहिं मनायो ।
त्रिभुवनपति होय भयो है भिखारी, यह अचरज मोहि आयो,
कहांते कनक फल खायो ॥३॥
कंद मूल मद मांस भखन कूं, नित प्रति चित्त लुभायो ।
श्री जिन बचन सुधा सम तजि कै, नयनानंद पछतायो,
श्री जिन गुण नहीं गायो॥४॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ५१ (विभिन्न कवियों के भजन)
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