अब मोहि तार लै शांति जिनंद। Ab Mohi Taar Le Shanti Jinand

अब मोहि तार लै शान्ति जिनन्द ॥ टेक ॥
कामदेव तीर्थंकर चक्री, तीनों पद सुखवृन्द । अब ॥ १ ॥
सुरनरजुत धरमामृत वरसत, शोभा पूरन चन्द । अब ।। २ ।
‘द्यानत’ तीनों लोक विघन छय, जाको नाम करन्द || अब ॥ ३ ॥

अर्थ: हे भगवान शान्तिनाथ ! अब मुझ को तार लीजिए। आप कामदेव हैं, चक्रवर्ती हैं, तीर्थंकर भी हैं। तीनों पद सुख के समूह हैं।

समवशरण में दिव्यध्वनि रूप में धर्मामृत की वर्षा हो रही है। देव व मनुष्य सभी वहाँ एकत्रित हैं। आपकी शोभा पूर्णिमा के चन्द्र समान सुन्दर व पूर्ण है।

द्यानतराय जी कहते हैं कि आपका नाम, आपका स्मरण, तीन लोक के समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है, उनका क्षय करने वाला है।

रचयिता: पंडित श्री द्यानतराय जी
सोर्स: द्यानत भजन सौरभ