आत्मन् हृदय के पट खोल, अब तो वीर प्रभु जय बोल | atman hrridaya ke pata khola aba to vira prabhu jaya bola

आत्मन् हृदय के पट खोल, अब तो वीर प्रभु जय बोल ।

कोई गावे कोई रोवे, उससे तू मत बोल।। टेक।।

तू न किसी का कोई न तेरा, नाटक करता मेरा-मेरा।
तुझे पड़ी है क्या दुनियाँ की, मत रस में विष घोल ।। 1 ।।

तेरी सूरत सुन्दर प्यारी, उसकी विमल छटा है न्यारी।
इधर-उधर क्यों फिरे भटकता, व्यर्थ बजावत ढोल ।। 2 ।।

तेरे घट में है परमातम, बनो मूढ़ मत भोले आतम।
तेरे घट में छिपा हुआ है, तेरा रत्न अमोल ।। 3।।

ज्ञान दीप ले तिमिर हटा दे, निर्मल आतम ज्योति जगा दे।
भक्ति तुला के मन के मन से, मन के मन को तोल ।। 4 ।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १२३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’