अहो ! जिनेश्वर तुम ही मेरे साँचे तारणहार हो | aho jineshvara tuma hi mere sa nche taranahara ho

तर्जः प्रभु हम सब का एक…

अहो ! जिनेश्वर तुम ही मेरे साँचे तारणहार हो।

प्रभु चरणों के ही प्रसाद से जाना जाननहार हो।। टेक ।।

महाभाग्य से प्रभु को पाया, आनंद मेरे उर न समाया।
ज्ञान प्रकाश हुआ अंतर में, मिटा मोह अंधियार हो।। 1।
कैसे भक्ति करूँ तुम्हारी, वीतराग हो परम उपकारी।
प्रभु पथ का अनुशीलन करके, होऊँ भव से पार हो ।। 2 ।।

अहो अतीन्द्रिय ज्ञान हुआ प्रभु, अहो अतीन्द्रिय सुख हुआ प्रभु।
सहज तृप्त संतुष्ट हुआ प्रभु, निर्विकल्प अविकार हो ।। 3 ।।

आराधन में जीवन अर्पित, हुआ स्वयं में स्वयं समर्पित ।
सहजभाव से करूँ वंदना, चाह न रही लगार हो।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ५३ से ५४
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’