अय महावीर जमाने में हितंकर तू है ।
सारे दुखियों के लिये एक दयाकर तू है ॥
तू ही है निर्भय करन और तरन तारन भी ।
तू है निर्दोष सिदाकत का भी रहबर तू है ॥
बेखकन तू है पहाड़ों का करम का बेशक ।
विश्व लोचन है तू ही ज्ञान का सागर तू है ॥
पाक बाणी है तेरी रमजे सिदाकत से भरी ।
नय व प्रमाण की तकमील का दफ्तर तू है ॥
तुझको नफरत है न रगबत है किसी से हरगिज ।
सब चराचर को समझता जो बराबर तू है ॥
तू ने पैगाम अहिंसा का सुनाया सबको ।
बस जमाने में हितोपदेशी सरासर तू है ॥
तू ने गुमराहों का रुख फेरा हकीकत की तरफ ।
हाँ हकीकत में हकीकत का समन्दर तू है ॥
तू निजानन्द में है लीन सरापा स्वामी ।
मोक्ष की राह का पुर नूर दिवाकर तू है ॥
दिल से न्यामत के जहालत की हो जुलमत काफूर ।
ज्ञान दर्शन का जहाँ में माहे अनवर तू है ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन ७१ (विभिन्न कवियों के भजन)