तर्ज-तुम्हारे दर्श बिन स्वामी…
अहो ! जिनराज दर्शन से, मुक्ति का मार्ग मिलता है।
मुमुक्षु जीव का हृदय, कमल की भाँति खिलता है ।। 1 ।।
वस्त्र भूषण सर्व दूषण, रहित स्वामी जगत् भूषण।
अचल आसन दिव्य भाषण, अहो अमृत सा घुलता है ।। 2 ।।
नहीं भय अब रहा कर्मों का, वे तो भिन्न दिखते हैं।
स्वयं ही निर्जरित होते, शुद्ध परिणाम चढ़ता है।।3।।
बाह्य सम्पत्ति सहज मिलती, किन्तु वह हेय सब भासी ।
होय उपयोग अन्तर्मुख, आत्म वैभव ही मिलता है।।4।।
अहो जिन ! आपकी मूरति, आप सम ही दिखाती है।
परम मंगलमयी जिनरूप से, चिद्रूप दिखता है ।।5।।
हृदय में आप हों प्रभुवर, हृदय हो आप में तन्मय।
आपके सामने आते, शीश चरणों में झुकता है।।6।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’