अपना ज्ञायक भगवान्, मैं सर्वोत्तम पहिचाना | Apan Jnayak Bhagavan Maim Sarvottam Pahican

अपना ज्ञायक भगवान्, मैं सर्वोत्तम पहिचाना।

नित्य निरंजन ध्रुव चिन्मूरति, निश्चय सिद्ध समाना।।टेक ।।

पर को व्यर्थ हि दोष दिया, निज भाव भूल दुःख पाया।
जब शुद्धातम अनुभव आया, आनंद उर न समाया।।1।।

ज्ञानानंदमय महास्वाद पा, बाहर कुछ न सुहावे ।
सादि अनंत रमूं निज में ही, यही भावना आवे।।2।।

सहज पूर्णता अपनी देखी, रही न चाह लगार।
ऐसी तृप्ति पाई मानो, आज हुआ भव पार ।।3।।

नहीं अब शंका नहिं भय मुझको, निज निर्भय पद पाया।
मुक्ति दशा भी सहजहिं होगी, सम्यक् निश्चय आया।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’