आत्मा सदाकाल निरोग।
क्यों उलझे तू पर उलझन में, निज का आनन्द छोड़ ॥ टेक ॥
राग रूप पुद्गल की परिणति, जोड़ न निज उपयोग।
है अन्यत्व सदा ही पर से, नहीं संयोग-वियोग॥ 1 ॥
जो संयोगी भाव रागादिक, वही महा भव-रोग।
द्रव्यदृष्टि से तुरंत नष्ट हो, फिर क्या करण योग॥ 2 ॥
ठंडे-गरम कठोर-मुलायम, मीठे सरस मनोग।
गंध रूप स्वर अक्ष विषय हैं, तू नहीं इनको भोग ॥ ३॥
कर्मों को जो संचित करता, विकृत योग-उपयोग।
वे भी नहीं स्वभाव आत्म का, होता है पर योग ॥ 4 ॥
तेरा ध्रुव ज्ञायक स्वभाव ही तेरा सुन्दर भोग।
प्रतिक्षण उसका अनुभव करना, आज मिला शुभ योग ॥ 5 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’