तर्जः आतम रूप अनुपम अद्भुत
आतम रूप अनुभवें मुनिवर ॥ टेक ॥
देह रहे पर देह से न्यारे, कर्म रागादि विकल्पों से न्यारे।
सब स्वांगों से भिन्न लखावें, निर्ग्रन्थ निरपेक्ष सहज रहावें ॥ 1 ॥
स्वयं सहज परिणमन दिखावे, दुःखमय कर्त्ता भाव न आवे।
इष्ट-अनिष्ट न भासे कोई, क्रोधादिक उत्पन्न न होवे ॥ २॥
बहे सु समता रस की धारा, मुनिवर सहज रहें अविकारा।
तृप्त रहें निज से निज माहीं, दोष शील में लागे नाहीं ॥ 3 ॥
आत्म ध्यान में शोभे निश्चल, वृद्धिगंत हो सहज आत्मबल।
निज बल से ही कर्म नशावें, मुक्तिमार्ग जग को दर्शावें ॥ 4 ॥
धन्य सहज मुनिवर का जीवन, सहज तत्त्व है सहज आराधन।
सहजपने हम भी प्रगटावें, भक्ति भाव से शीश नवावें ॥ 5॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८२ से १८३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’