एक ब्रह्म तिहुँलोकमँझार | Ek Brahm Tihun Lok Manjhar

एक ब्रह्म तिहुँलोकमँझार

एक ब्रह्म तिहुँलोकमँझार, ऐसैं कहैं बनै नहिं यार ॥टेक॥

और हुकमतैं मारै और, और पुकार करै उस ठौर ॥1॥
षट रस भोजन जीमैं धीर, भीख न पावै एक फकीर ॥2॥
धरमी सुरगमाहिं सुख करै, पापी नरक जाय दुख भरै ॥3॥
एकरूप अविनाशी वस्त, खंड-खंड क्यों भया समस्त ॥4॥
शुद्ध निरंजन शुचि अविकार, क्यों कर लयो गरभ अवतार ॥5॥
करम बिना इच्छा क्यों भई, इच्छा भई शुद्धता गई ॥6॥
जीव अनन्त भरे भुविमाहिं, ‘द्यानत’ कर्म कटैं शिव जाहिं ॥7॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)

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