तर्जः जन गण मन…
अरहंत सिद्ध आचार्य उपाध्याय,
सर्व साधु सुखदाता ।
इन्द्र-नरेन्द्र यथा सुर जेते, पण्डित बुधजन सारे,
भव दुख भंजन, शीस नमावत, रक्षक तुम्हीं हमारे।
जब शुभ मानस ध्याये,
तब शुभ आशिष पाये।
गाये तव यह गाथा,
भव दुख बाधा हरो हमारी, तुम्हें नमावत माथा।
जय हे- जय हे- जय हे, सर्व साधु सुख दाता ।।
चारों गति में भ्रमत फिरे हैं, दुःख अनेक उठाए,
ज्ञान चक्षु जब खुले हमारे, तब तुम दर्शन पाये।
सुख की आश लगाए,
हम सब तुम्हारे ढिंग आए।
कहाँ मिले सुख साता ।।
नाथ तुम्हारे पथ पर चलकर, मुक्ति पथ मिल जाता।
जय हे- जय हे- जय हे, सर्व साधु सुखदाता ।।
देव-शास्त्र-गुरु
मंगल तत्त्व
भव्य हृदय
पाये,
सुनाए।
हरषाता ।।
तव चरणाम्बुज सेवन करके, निज वैभव मिल जाता।
जय हे-जय हे-जय हे, सर्व साधु सुखदाता ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २७ से २८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’