अंतरंग प्रीति से सुनना, अहो ! भव्यजन जिनवाणी।
सहज परम प्रीति से सुनना, अहो ! भव्यजन जिनवाणी।। टेक ।।
सुनी अनसुनी कभी न करना, अनेकान्तमय तत्त्व समझना।
सम्यक् भेदविज्ञान सु-करना, ज्ञानमात्र शुद्धात्म समझना।।
स्वानुभूति से करो प्रमाणित, अहो ! भव्यजन जिनवाणी ।।1 ।।
बिना ज्ञान वैराग्य न होवे, बिन वैराग्य ज्ञान नहीं होवे।
ज्ञान-वैराग्य आत्मामय है, आत्मानुभव ही आनंदमय है ।।
आत्मार्थी हो सुनना पढ़ना, अहो ! भव्यजन जिनवाणी।।2।।
विषय-कषायों की नाशक है, वीतरागता की पोषक है।
मोह नशावे ज्ञान प्रकाशे, द्रव्य-भाव-नोकर्म विनाशे ।।
अभ्यासो उल्लास सहित नित, अहो ! भव्यजन जिनवाणी ।।3 ।।
मत शब्दों को कभी पकड़ना, नहीं पक्ष का पोषण करना।
गुरुओं का अभिप्राय समझना, पक्षातिक्रांत स्वरूप समझना।
अंतर में रमना सिखलाती, अहो ! भव्यजन जिनवाणी ।।4।।
महाभाग्य जिनवाणी पाई, वीतरागता हमें सुहाई ।
भव-भव के संताप नशाती, मोक्षमार्ग में हमें लगाती ।।
करें वंदना भक्तिभाव से, उर में धारें जिनवाणी ।।5।।
गुरु भक्ति
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ १७५