तर्जः गाड़ी खड़ी रे खड़ी…
आओ आओ रे सभी मिल आओ, श्री जिनमंदिर में ।। टेक ।।
धन्य भाग्य हमको मिला, जिनमंदिर अविकार।
मारवाड़ संसार में, धर्म कल्पतरू सार।। 1।।
जिनमंदिर में शोभते, मनहारी जिनबिम्ब ।
जिनके दर्शन से दिखे, अन्तर में चिद्बिम्ब ।। 2।।
जिनमंदिर में गूँजती, जिनवाणी अविकार ।
सुनते ही आनन्द हो, समझत हो भव पार।। 3।।
जिनमंदिर में सहज हो, साधर्मी सों मेल।
जिनके सत्संग में लगे, मुक्तिमार्ग भी खेल।। 4।।
जिनमंदिर में हो रही, जिनभक्ति सुखकार ।
जिससे पाप विनष्ट हों, बढ़े पुण्य भंडार।। 5।।
जिनमंदिर में हो रहा, पंचकल्याणक पाठ।
देखत अति आनन्द हो, देखो कैसा ठाठ ।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५ से १६
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’