स्थायी (टेक):
आयो–आयो रे! अठाई पर्व, महा आनंदमयी।
गाओ–गाओ रे! सभी मिल भव्य, भक्तियाँ ज्ञानमयी॥
भाओ–भाओ रे! भावना आज, सहज वैरागयमयी॥
चरण:
अहो! ज्ञानियों को तो सहजहिं, भक्तिभाव उमगावे।
पर्व अठाईं में इन्द्रादिक सुर नन्दीश्वर जावें॥ १ ॥
यद्यपि शक्ति गमन की नाहिं, तदपि भावना भावें।
महाहर्ष से जिनमंदिर में, प्रभु की भक्ति रचावें॥ २ ॥
जिनमंदिर है अशरण जग में, सहज शरण सुखकारी।
दर्शावे जिनबिम्ब मनोहर, चित्स्वरूप अविकारी॥ ३ ॥
ध्रुव अकृत्रिम है नन्दीश्वर, अकृत्रिम जिनमंदिर।
अकृत्रिम जिनबिम्ब विराजे, रत्नमयी उन-अंदर॥ ४ ॥
सुने-पढ़े जिन-आगम माँहि, प्रत्यक्षवत् दिखलावे।
अहो! ज्ञान की अद्भुत महिमा, गुण अनंत विलसावे॥ ५ ॥
जयवन्तो! जिनबिम्ब जगत में, ज्यों अर्हत् परमातम।
हो निहाल नित शीश नवावें, ध्यावें निज शुद्धातम॥ ६ ॥
Artist- ब्र. श्री रविन्द्र जी आत्मन्