अब मोहि जानि परी, भवोदधि तारनको है जैन
अब मोहि जानि परी, भवोदधि तारनको है जैन ।।टेक।।
मोह तिमिर तैं सदा कालके, छाय रहे मेरे नैन ।
ताके नाशन हेत लियो, मैं अंजन जैन सु ऐन ।।१।।अब. ।।
मिथ्यामती भेषको लेकर, भाषत हैं जो वैन ।
सो वे बैन असार लखे मैं, ज्यों पानीके फैन ।।२।।अब. ।।
मिथ्यामती बेल जग फैली, सो दुख फलकी दैन ।
सतगुरु भक्तिकुठार हाथ लै, छेद लियो अति चैन ।।३।।अब. ।।
जा बिन जीव सदैव कालतैं, विधि वश सुखन लहै न ।
अशरन-शरन अभय ‘दौलत’ अब, भजो रैन दिन जैन ।।४।।अब. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ५४
अर्थ
अर्थ-अहो, आज मुझे यह भलीभांति ज्ञात हो गया है कि संसार-सागर से तारने के लिए एक जैनधर्म ही समर्थ है। अहो, अनादि काल से मेरे नेत्र मोहरूपी अन्धकार से आच्छादित थे, किन्तु आज मैने उस मोहरूपी अन्धकार को नष्ट करने के लिए जैनधर्म का श्रेष्ठ अंजन ग्रहण कर लिया है। संसार में अनेक मिथ्यादृष्टि जीव नाना भेष धारण करके बहुत बातें कहते हैं, किन्तु आज मैंने उनके वचनों को पानी के बुलबुलों की भाँति असार जान लिया है। ससार में मिथ्यादृष्टियों की बेल बहुत फैल रही है और वह दुःखरूप फल को ही उत्पन्न करनेवाली है, किन्तु मैने तो सद्गुरु के उपासनारूपी कुठार को हाथ मे लेकर उसका नाश कर दिया है और परमसुख को प्राप्त कर लिया है। कविवर दौलतराम कहते हैं कि हे भाई ! जिसके बिना जीव अनादिकाल से कर्मो के अधीन पड़ा है, सुख की प्राप्ति नहीं कर पाया है, जो अशरणों का शरण है और सबको भय-रहित करता है, उस जैनधर्म की दिन-रात उपासना करो।
शब्दार्थ: सद्गुरु-१ के:२ भै:३ में।
स्रोत: दौलत विलास, पद 79।
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