राग : ओह रे ताल मिले नदी के जल में ( 1968 )
ओह रे आज मिली प्रभु की वाणी अनुभव तू कर ले रे
नर तन फिर कब ये मिलेगा कोई जाने ना… कोई जाने ना
दुर्लभ है नित निगोद से तेरा बाहर आना … तेरा बाहर आना
एकेंद्रिय विकलत्रय से पंचेंद्रिय का पाना… पंचेंद्रिय का पाना
हो भविया रे… एकेंद्रिय विकलत्रय से पंचेंद्रिय का पाना
कितना दुर्लभ है ये मन कोई जाने ना…
पाया नर तन मन तूने जिनकुल का पावना … जिनकुल का पावना..
जिनवाणी और गुरूओं का संगम भव्यात्मा … संगम भव्यात्मा…
हो भविया रे… जिनवाणी और गुरूओं का संगम भव्यात्मा…
कितना सुख है आतम में कोई जाने ना…
जिनवाणी सुनकर अपना मिथ्यातम हर ले रे… मिथ्यातम हर ले रे..
परिग्रह को त्याग दिगंबर दीक्षा तू धर ले रे…दीक्षा तू धर ले रे…
हो “ज्ञायक” रे… .परिग्रह को त्याग दिगंबर दीक्षा तू धर ले रे…
मोक्ष अगर हुआ ना फिर तो … कोई जाने ना…
पं० ज्ञायक जैन शास्त्री, अहमदाबाद
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