तर्ज : जिनवर की परमार्थ भक्ति करेंगे…
आया है अवसर भक्ति करेंगे।
प्रभु सम ही अन्तर्दृष्टि धरेंगे ।। टेक ।।
प्रभु गुण गायें, भेद-ज्ञान पायें,
अज्ञानमय दुर्विकल्प नशायें।
आतम परमातम है, अनुभव करेंगे।। 1।।
प्रभु दर्शन कर भाव उमगता,
ज्ञान-वैराग्य सहज ही बढ़ता।
अकर्त्ता हो, हाथ पर हाथ धरेंगे।। 2।।
जगत् विभव निस्सार दिखाया,
विषयों का सब राग नशाया।
निर्ग्रन्थ हो, मुक्ति साधन करेंगे।। 3।।
परम ब्रह्ममय रूप हमारा,
चिदानंद चिद्रूप अविकारा।
सहज परम ब्रह्मचर्य धरेंगे।। 4।।
अशरण जगत् में एक शरण है,
ज्ञायक ही साँचा तारण-तरण है।
ज्ञायक के आश्रय से भव से तिरेंगे ।। 5।।
उपकार आपका कैसे हम गायें,
भक्ति भाव से शीस नवायें।
पावें परम पद, तृप्त रहेंगे।। 6।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ४२ से ४३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’