अहो ! जिनराज मेरे ज्ञान में हैं आये | aho jinaraja mere j nana mem haim aye

अहो ! जिनराज मेरे ज्ञान में हैं आये।

परमानन्द मेरे उर न समाये ।। टेक।।

मोह-क्षोभ आदि सब दोषों से हीन हैं।
ज्ञानमय निज आनन्द माँहि लीन हैं ।।
वीतराग देव मेरे ज्ञान में हैं आये ।। 1।।

लोक अरु अलोक ज्ञान माँहि प्रतिभासे ।
तीन लोक युगपत् प्रत्यक्ष भासे ।।
सर्वज्ञ देव मेरे ज्ञान में हैं आये ।। 2।।

नहिं होवे जिनके ज्ञप्ति परिवर्तन ।
चेतन चैतन्य अरु चिद् विवर्तन ।।
चिद्रूप प्रभु मेरे ज्ञान में हैं आये।। 3।।

साक्षी में प्रभुवर के शिवपन्थ जाना।
प्रभु सा ही प्रभु रूप निज में पिछाना ।।
ज्ञाता स्वरूप मेरे अनुभव में आये ।। 4।।

प्रभु के समान में करूँगा आराधना।
निर्ग्रन्थ साधु हो करूँगा निज साधना ।।
शुद्ध भाव मेरे हृदय में जगाये ।। 5।।

ज्ञायक के आश्रय से उत्कृष्ट साधक हो।
साध्य दशा पाऊँगा कोई नहिं बाधक हो ।।
चरणों में भक्ति से सिर हैं नवाये।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’