उपकार जिनवर आपका है अहो ! परमानंदमय | upakara jinavara apaka hai aho paramanamdamaya

उपकार जिनवर आपका है अहो ! परमानंदमय ।

निर्वाण प्रभुवर आपका है अहो ! परमानंदमय ।। टेक ।।

चिद्रूप शुद्धातम दिखाया, अहो ! परमानंदमय ।
परिणमन स्वाश्रित हुआ प्रभु, अहो ! परमानंदमय ।। 1 ।।

उपयोग में उपयोग भासा, अहो ! परमानंदमय ।
चिरकाल का दुर्मोह नाशा, अहो ! परमानंदमय।। 2।।

ज्ञानमय अनुभवन वर्ते, अहो ! परमानंदमय ।
ज्ञानमय जीवन हुआ प्रभु, अहो ! परमानंदमय।। 3।।

निर्ग्रन्थ हो निर्द्वन्द्व विचरूँ, अहो ! परमानंदमय ।
निज ध्यान धारा सहज वर्ते, अहो ! परमानंदमय ।। 4।।

दुष्कर्म विनशें सुगुण विलसें अहो ! परमानंदमय ।
तिष्हूँ प्रभु के पास प्रभु हो, अहो ! परमानंदमय ।। 5।।

जयवन्त वर्ते जैनशासन, अहो ! परमानंदमय ।
प्रभु हो सहज अद्वैत वंदन, अहो ! परमानंदमय।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’