अमृत झरता रे ज्ञायक भाव में | Amrt Jharat Re Jnayak Bhav Mem

तर्ज : राग मल्हार …

अमृत झरता रे ज्ञायक भाव में।

उछले संर्वांग में, झरता सदैव रे।।टेक ।।

जब तक भान नहीं ज्ञायक का, भ्रमत फिरे संसार में।
जब ज्ञायक दृष्टि में आवे, तृप्त होय समयसार में ।।1 ।।

मोह पलावे, दुःख नशावे, उदासीनता आवे।
एकाकी हो आत्म ध्यान की, क्षण-क्षण हौंस उमगावे ।। 2 ।।

सहज होय निर्ग्रन्थ दशा, आनन्दमय प्रचुर स्वसंवेदन।
क्षपक श्रेणी आरोहण होवे, केवलज्ञान सहज पावन ।।३ ।।

निज महिमा में मग्न सदा ही, जीव सिद्ध कहलावे।
आवागमन विमुक्त होय, अविरल निज में तिष्ठावे ।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’