अहो ! स्वाश्रय से हो पुरुषार्थ ।
द्रव्यदृष्टि से ही आत्मन् प्रगटेगा सुख परमार्थ ॥ टेक ॥
पुरुष आत्मा अर्थ प्रयोजन, सुख के हेतु सभी आयोजन ।
जब तक नहीं पहचान स्वयं की, झूठा सब पुरुषार्थ ॥ 1 ॥
वस्तु स्वभाव सहज ही रहता, काललब्धि भवितव्य भी होता।
निमित्त भी होता है पर निश्चय ही प्रधान पुरुषार्थ ॥ 2 ॥
जब आतम का अनुभव जागे, आनंद रस में परिणति पागे।
तब निज में ही स्थिरता का, स्वयं जगे पुरुषार्थ ॥ 3 ॥
बिन पुरुषार्थ मुक्ति नहीं होना, व्यर्थ पराई आशा करना।
तज प्रमाद अरु आस पराई, कर सम्यक् पुरुषार्थ ॥ 4 ॥
देव-धर्म-गुरु श्रद्धा करके, भेद-विज्ञान चित्त में धरके।
तत्त्व विचार करो स्वानुभव से, सफल करो पुरुषार्थ ॥ 5॥
निमित्तादि सब स्वयं मिलेंगे, गुणस्थान भी सहज चढ़ेंगे।
सब संकल्प-विकल्प छोड़कर, साधो इक परमार्थ ॥ 6 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३४७ से ३४८
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’