अहो झूलते प्रशम भाव में, देखो ज्ञानी संत रे।
अहो स्वानुभव रस आस्वादें, आतम ध्यानी संत रे ॥ टेक ॥
चित्स्वरूप को ध्याते-ध्याते, करें भव का अन्त रे।
निस्पृह हो जग में दर्शावें, साँचा मुक्ति पंथ रे॥ 1 ॥
पशु भी बोध लहें चरणों में, चक्री शीश धरन्त रे।
घोर परीषह उपसर्गों में, समता धरें अनन्त रे ॥ 2 ॥
राग न जिनके द्वेष न जिनके समरस माँहि रमन्त रे।
एकाकी निर्द्वन्द रहें नित, निज में केलि करन्त रे॥ ३॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८५
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’