आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ | Ap Bhramavinash Ap Ap Jan Payau

आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ

आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ,
कर्णधृत सुवर्ण जिमि चितार चैन थायौ ।।आप.।।

मेरो मन तनमय, तन मेरो मैं तनको
त्रिकाल यौँ कुबोध नाश, सुबोधभान जाग्यौ ।।१।। आप. ।।

यह सुजैनवैन ऐन, चिंतन पुनि पुनि सुनैन,
प्रगटो अब भेद निज, निवेदगुन बढायौ ।।२।। आप. ।।

यौँ ही चित अचित मिश्र, ज्ञेय ना अहेय हेय,
इंधन धनंजय जैसे, स्वामियोग गायौ ।।३।। आप. ।।

भंवर पोत छुटत झटति, बांछित तट निकटत जिमि,
रागरुख हर जिय, शिवतट निकटायौ ।।४।। आप. ।।

विमल सौख्यमय सदीव, मैं हूँ मैं नहिं अजीव,
द्योत होत रज्जु में, भुजंग भय भगायौ ।।५।। आप. ।।

यौँ ही जिनचंद सुगुन, चिंतत परमारथ गुन,
‘दौल’ भाग जागो जब, अल्पपूर्व आयौ ।।६।। आप. ।।


Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ११३ से ११४

अर्थ

अर्थ-अहो, आज मैंने स्वयं अपना भ्रम दूर करके अपने आपको जान लिया है और इससे मुझे उसी प्रकार शान्ति का अनुभव हुआ है, जिस प्रकार किसी बाहर ढूँढनेवाले व्यक्ति को अपना सोना अपने ही कान में देखकर होता है।

आज, शरीर मेरा है, मैं शरीरमय हूँ और मैं शरीर का हूँ-इत्यादि प्रकार का मेरा अज्ञान नष्ट हो गया है और सज्ञानरूपी सूर्य उदित हो गया है। आज मैंने जिनेन्द्रदेव के परमसत्य वचनों का वार-बार भली प्रकार चिन्तन किया है, जिससे मेरे अन्दर भेदज्ञान प्रगट होकर आत्मज्ञान की वृद्धि हो गयी है। जगत में जितने भी चेतन, अचेतन और मिश्र पदार्थ हैं, उनमें से न कोई उपादेय है और न हेय, अपितु वे सभी मात्र ज्ञेय हैं। उनका ज्ञान के साथ वैसा ही उत्तम योग है जैसा ईधन और अग्नि का बताया गया है। जिस प्रकार जहाज भंवर में से छूटने के बाद शीघ्र अपने इच्छित किनारे पर जा लगता है, उसी प्रकार यह जीव अपने मोह-राग-द्वेष को दूर करके शीघ्र मोक्ष के समीप पहुंच जाता है। आज मेने यह भलीभाँति जान लिया है कि मै तो सदा अनन्त सुखमय तत्त्व हूँ, अजीव नहीं हूँ। इससे मेरा समस्त अज्ञान उसी प्रकार नष्ट हो गया है, जिस प्रकार प्रकाश होते ही रस्सी में सर्प होने का भय समाप्त हो जाता है। कविवर दौलतराम कहते हैं कि आज जिनेन्द्रदेव के सच्चे गुणों का चिन्तन करने से मुझे परमार्थ की प्राप्ति हुई है और मेरे ऐसे भाग्य जगे हैं कि मेरा ससार-भ्रमण अति ही अल्प शेष रह गया है। विशेष इस पद मे कविवर दौलतराम ने जो हेय-ज्ञेय-उपादेय की चर्चा की है, वह अत्यन्त सूक्ष्म एवं प्रयोजनभूत है। सक्षेप में उसका भाव यह है कि इस जगत में अनन्त पदार्थ है, परन्तु परमार्थ से उनमे न कोई हेय है और न कोई उपादेय। वे तो सभी मात्र ज्ञेय है। अतः उनको जानने में कोई दोष नहीं है। दोष तो मात्र मोह-राग-द्वेष करने मे है। यदि यह जीव जगत के पदार्थों को जानते हुए मोह-राग-द्वेप न करे तो इसका सम्पूर्ण दुःख मिट सकता है और इसे सच्ची शान्ति का अनुभव हो सकता है।

स्रोत: दौलत विलास, पद 88।

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