आप भ्रमविनाश आप आप जान पायौ,
कर्णधृत सुवर्ण जिमि चितार चैन थायौ ।।आप.।।
मेरो मन तनमय, तन मेरो मैं तनको
त्रिकाल यौँ कुबोध नाश, सुबोधभान जाग्यौ ।।१।। आप. ।।
यह सुजैनवैन ऐन, चिंतन पुनि पुनि सुनैन,
प्रगटो अब भेद निज, निवेदगुन बढायौ ।।२।। आप. ।।
यौँ ही चित अचित मिश्र, ज्ञेय ना अहेय हेय,
इंधन धनंजय जैसे, स्वामियोग गायौ ।।३।। आप. ।।
भंवर पोत छुटत झटति, बांछित तट निकटत जिमि,
रागरुख हर जिय, शिवतट निकटायौ ।।४।। आप. ।।
विमल सौख्यमय सदीव, मैं हूँ मैं नहिं अजीव,
द्योत होत रज्जु में, भुजंग भय भगायौ ।।५।। आप. ।।
यौँ ही जिनचंद सुगुन, चिंतत परमारथ गुन,
‘दौल’ भाग जागो जब, अल्पपूर्व आयौ ।।६।। आप. ।।
Artist: कविवर श्री दौलत राम जी
स्रोत: दौलत भजन सौरभ, पृष्ठ ११३ से ११४
