अन्तर्मुखी हो प्रभुवर जिन भावना मैं भाऊँ | antarmukhi ho prabhuvara jina bhavana maim bhau n

तर्ज : हे पार्श्वनाथ भगवन…

अन्तर्मुखी हो प्रभुवर जिन भावना मैं भाऊँ।

आनन्दमग्न होकर, जिन भावना मैं भाऊँ ।। टेक ।।

दुर्मोह नाशने का अनुभूत मार्ग पाया।
निर्मोह ज्ञानमय प्रभु, अपना स्वरूप ध्याऊँ ।। 1।।

भोगूँ अतीन्द्रिय आनन्द, निज में ही तृप्त वर्तुं ।
निष्काम निर्विकारी, ब्रह्मचर्य पूर्ण पाऊँ ।। 2।।

कर्तृत्व बुद्धि नाशी, भवितव्य सहज भासा।
निर्भार तुष्ट निज में, ज्ञाता सहज रहाऊँ।। 3।।

चाहे जो उदय आये, चाहे जो परिणमन हो।
नहीं राग-द्वेष होवे, समता सहज धराऊँ।। 4।।

सर्वस्व निज का निज में, मैने प्रत्यक्ष देखा।
निज में ही लीन होऊँ, पर में नहीं भ्रमाऊँ।। 5 ।।

कर्मों का हो न आश्रव, हो निर्जरा सहज ही ।
निर्मुक्त ध्रुव अनुपम, पंचम गति सु-पाऊँ ।। 6।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’