अज्ञानी प्राणी से कहें गुरु ज्ञानी,
महिमा है सिद्ध समान रे ।। टेक ।।
एकत्व पर में तू करके भटकता,
पुण्य-पापमय भव-भव में रुलता।
जाना न जाननहार, इसी से अज्ञानी ।। महिमा. ।। 1 ।।
मानी न प्रभुता, प्रभुता है फिर भी,
निश्चय से देखे भगवान् तू भी।
अकलंक मूरति परमाभिरामी ।। महिमा. ।। 2।।
सौभाग्य से आज अवसर है आया,
अध्यात्म संदेश तुमको सुहाया।
स्वानुभूति पाकर बनो आत्मज्ञानी ।। महिमा. ।। 3।।
आनन्द अतीन्द्रिय अहो प्रगटाए,
पुरुषार्थ थिरता का बढ़ता ही जाए।
धन्य मुनिदशा हो परम सुख निधानी ।। महिमा. ।। 4 ।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२९
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’