आनन्द का दिन आयेगा आयेगा,
निर्ग्रन्थ जीवन आयेगा आयेगा।। टेक।
स्वरूप निर्ग्रन्थ, श्रद्धा है निर्ग्रन्थ।
भाऊँ सहज ही मैं भावना निर्ग्रन्थ।।
निर्ग्रन्थ परिणाम आयेगा2।।1।।
अणुमात्र भी मुझको, मेरा न दिखता।
ज्ञायक स्वयं में ही परिपूर्ण दिखता।।
प्रचुर स्वसंवेदन आयेगा2।।2।।
संयोग के काल में ही हैं न्यारे।
संयोग होते कभी न हमारे।।
निरपेक्ष जीवन आयेगा2।।3।।
वैभव स्वयं का, स्वयं में ही शाश्वत।
प्रभुता स्वयं की स्वयं में ही शाश्वत।।
स्वाधीन जीवन आयेगा2।।4।।
बाहर से कुछ भी आता नहीं है।
अपना कभी कुछ न जाता कहीं है।।
निश्चिंत जीवन आयेगा2 ।।5।।
स्वभाव से ही ज्ञानमयी हूँ।
स्वभाव से ही आनंदमयी हूँ।।
निर्द्वन्द जीवन आयेगा2।।6।।
तृप्त स्वयं में, तुष्ट स्वयं में।
लीन स्वयं में, मग्न स्वयं में।।
सिद्धों सा जीवन आयेगा2।। 7।।
वस्तु स्वरूप सदा है अवस्थित।
मार्ग यही है हुई मति व्यवस्थित।।
प्रभुतामय जीवन आयेगा2।। 8।।
रचियता - पूजनीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - जिन भक्ति सिंधु