अरे निज बतियाँ क्यों नहीं जानै
(राग सोहनी)
अरे निज बतियाँ क्यों नहीं जानै ॥टेर ॥
चेतन रूप अनूप तिहारो, अचल अबाधि अडोलै ।
जन्म मरण को छेदनहारो, ग्यान अखंड अतोलै ॥१॥
कुगुरुन को परसंग पाय के ओलों सोलों डोलै ।
पर पदार्थ निजरूप मान के मिथ्या करत किलोलै ॥२॥
एक समय भी आप लखे तो, पावे रतन अमोलै ।
मिथ्या दरशन ज्ञान चरण की फेर न मांचत रोलै ॥३॥
कर कर मोह शिथिल लखि आतम, स्यादवाद जुत तोले।
राम कहै उतपति नाशत है अर थिर थान विरोले ॥४ ॥
स्रोत: आध्यात्मिक भजन संग्रह (सं. श्री सौभाग्यमल जैन, पं. टोडरमल स्मारक ट्रस्ट, जयपुर, २००६), भजन २३ (विभिन्न कवियों के भजन)
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