अहो ! निर्ग्रन्थ गुरुवर का दर्श साक्षात् कब होवे | Aho Nirgranth Guruvar Ka Dars Saksat Kab Hove

तर्ज : तुम्हारे दर्श बिन स्वामी…

अहो ! निर्ग्रन्थ गुरुवर का दर्श साक्षात् कब होवे।
यही है भावना मेरी, दशा निर्ग्रन्थ कब होवे।।1।।

चित्त घबराया है मेरा, असत् जग के प्रपंचों से।
रहूँ एकाकी जंगल में, निस्पृही परिणति होवे।।2।।

विषय के रोगियों को देखकर, करुणा ही आती है।
विनाशी इन्द्रिय भोगों से, उदासी सहज ही होवे ।।3।।

अबाधित पुण्य की तृष्णायतनता, दीखती जग में।
तृप्ति पर में असम्भव है, तृप्ति निज में सहज होवे।।4।।


स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २२०