अहो! निज अनुभव ही सुखकार
अहो! निज अनुभव ही सुखकार ।
शाश्वत परमात्म शुद्धात्म ही त्रिभुवन में सार ।।टेक।।
एक अखण्डित ज्ञानमयी, चिन्मूर्ति सदा अविकार ।
भरा हुआ सर्वांग जिसमे, सहज ज्ञानानन्द अपार ।।1।।
जिसकी किंचित् मात्र विराधन का फल है संसार ।
सिद्ध दशा जिसके आराधन का ही हितकार ।।2।।
नहिं प्रमत्त नहिं अप्रमत्त, जो एक रूप अविकार ।
ज्ञायक परम पारिणामिक, ध्रुव मंगलमय अवधार ।।3।।
प्रभो! आपने ही दर्शाया, किया महा उपकार ।
निज में ही रम जाऊँ भावना, वन्दन अगणित बार ।।4।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९९ से १००