तर्ज : मैया त्रिशला …
अपनो शुद्धातम भगवान् सहज ही जाननहारा है।
जाननहारा है कि केवल जाननहारा है ।। टेक ।।
अरस अरूपी अस्पर्शी है, गंध शब्द नहिं जिसमें दीखे।
अनिर्दिष्ट संस्थान, अलिंगग्रहण चेतन प्यारा है ।।1।।
देह न वाणी मन नहिं जिसके, कर्मबन्ध रागादि न जिसके ।
सदाकाल पर्यय गुण भेदों से भी न्यारा है ।।2।।
शक्ति अनन्ता फिर भी ज्ञानमय, सहज पवित्र अभेद आनन्दमय ।
झलके लोकालोक तदपि निज वेदनहारा है ।। 3 ।।
भाव पराश्रित सब दुःखदाई, स्वाश्रित भाव सहज सुखदाई ।
परम पारणामिक प्रभु ही बस तारणहारा है ।।4।।
दुर्विकल्प मन एक न लाऊँ, अब तो निज में ही रम जाऊँ।
अशरण जग में शुद्धातम ही एक सहारा है।।5।।
स्रोत: भक्ति-भावना (द्वितीय खण्ड)
Artist: श्री ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: डॉ. विनोद ‘चिन्मय’