आवे गुरुवर याद तुम्हारी, आवे मुनिवर याद तुम्हारी ॥ टेक ॥
जब से गुरु स्वरूप है जाना, होय भावना निशदिन म्हारी।
धन्य भाग्य प्रत्यक्ष लखावें, वीतराग मुनि मुद्रा प्यारी ॥ 1 ॥
साँचे तारण-तरण तुम्हीं हो, दुनियाँ तो स्वारथ की सारी।
जग-प्रपंच से चित घबरावे, साधु दशा लागे सुखकारी ॥ 2॥
रहित अडम्बर सहज दिगम्बर, तृप्ति स्वयं में मंगलकारी।
नहीं आरम्भ नहीं कुछ चिन्ता, धनि स्वाधीन वृत्ति अविकारी ॥ 3 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १८३
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’