अर्हन् जिनेन्द्र भगवान्, तुम विश्व विजय पाई | arhan jinendra bhagavana tuma vishva vijaya pai

तर्जः प्रभु शांत छवि तेरी अंतर में …

अर्हन् जिनेन्द्र भगवान्, तुम विश्व विजय पाई।

यह शान्ति रूप मुद्रा, नैनों में आ समाई ।। टेक ।।

महिमा समवशरण की, जग ने अपार जानी।
शत् इन्द्र तुम्हें पूजें, चरणों में शीस नाई ।। 1।।

देवाधिदेव मेरे, अरहन्त देव मेरे।
संसार सिन्धु तिरके, तुम सिद्ध दशा पाई ।। 2।।

ओंकार रूप वाणी, निर-अक्षरी बखानी।
सब देश-वासियों को निज भाष परिणमाई ।। 3।।

सप्तभंग स्याद्वादी, गणधर गूँथी अनादि ।
याके प्रसाद भविजन, पंचम गति सु पाई ।। 4।।

आचार्य गुरु निरंजन, उवझाय साधु भगवन।
जग से उदास हो के, तप ध्यान धुनि रमाई ।। 5।।

मिथ्यात्व को मिटाया, संयम सु पंथ ध्याया।
सब छोड़ मोह माया, शुद्धात्म लौं लगाई ।। 6।।

महिमा परम गुरु की, वरनी न जाय सेवक।
करते हैं ध्यान हरदम, त्रय योग को मिलाई ।। 7।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २६ से २७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’