आया है अवसर समझो स्वयं को | aya hai avasara samajho svayam ko

आया है अवसर समझो स्वयं को।

आया है अवसर धारो धरम को ॥ टेक ॥
दुर्लभ है संज्ञित्व, दुर्लभ जिनागम,
दुर्लभ है अनुकूलता और समागम।
जिनदेशना सुन जानो मरम को ॥ 1 ॥

आलस्य छोड़ो, पुरुषार्थ ठानो,
प्रयोजन भूत सु तत्त्व पिछानो।
कर भेद-विज्ञान त्यागो भरम को ॥ २॥

प्रभुतामयी शुद्ध आतम विचारो,
प्रभुतामयी परमातम निहारो।
स्वानुभूति पाओ नाशो करम को ॥ ३॥

जिन दर्श कर जिन भावना भाओ,
विज्ञानघन से निवृत्ति बढ़ाओ।
निर्ग्रन्थ विचारो तजो जग शरम को ॥ ४ ॥

समयसार ध्याओ, समयसार पाओ,
निजानंद में लीन, अविचल रहाओ।
स्वाश्रय से पाओ, सहज पद परम को ॥ ५॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ ३५१ से ३५२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’