मृत्युका नाम सुनते ही मनुष्यके मनमें भय और दुखका संचार होने लगता है। यदि मनुष्यका वश चले तो वह कभी भी मरनेके लिए तैयार न हो । मृत्युकी वेला उपस्थित होते ही वह सोचता है- ‘हाय ! अपने भुज-बलसे अजित इस विभूति और इस हरे-भरे प्राण-प्रिय परिवारको छोड़कर चल देना होगा। कैसे छोड़ इन्हें ? इनकी कौन देख-भाल करेगा और इस सम्पत्तिका भी पता नहीं कौन कैसा उपयोग करेगा ? हाय ! में मरा ! क्या कोई भी ऐसी शक्ति, ओषधि एवं सम्बन्धी नहीं जो मुझे कराल कालके द्वारा कवलित होनसे बचा सके ।’ सारांश यह है कि मृत्युके क्षण उपस्थित होते ही मनुष्य उससे बचनेका वश भर प्रयत्न करता है। ममत्व और मोहका वह पिण्ड बन जाता है। प्रत्येक वस्तुसे उसका आत्म-भाव इतना तीव्र जागृत हो जाता है कि उसे छोड़ते हुए वह मर्मान्तक वेदनाका अनुभव करता है। परन्तु जिस व्यक्तिको आत्माका यथार्थ ज्ञान होता है, मृत्यु उसके मनमें भय और दुखका तनिक भी संचार नहीं कर पाती। वह आत्माके सिवाय अन्य समस्त वस्तुओंको समझता है और उनमें उसकी लेशमात्र भी ममता नहीं होती। यही कारण है कि मौतके अवसर पर अपनी समस्त विभूति और समृद्ध परिवार छोड़ते हुए भी उसे किञ्चित् भी दुख नहीं होता । यतः जन्म-जन्मान्तरका मूल कारण आत्मा एवं पर-वस्तुओंमें सम्यक् श्रद्धाका अभाव है और इसी कारण मानव पर-वस्तुओंमें ममत्व रखता है और जन्म-मरणके चक्रमें फँसा रहता है, अतः सम्यक् श्रद्धा जागृत होते ही यथार्थ आत्म-बोधी अपने को अमर मानने लगता है ।