अर्थ
संसारमें इस प्रकारके अधिक मनुष्य मिलेंगे, जिन्हें पाप-कार्योंस किसी प्रकारकी घृणा नहीं है। इसके विपरीत उन्हें पाप करते समय अद्भुत आनन्दका अनुभव होता है। वे हिंसा करेंगे तो उन्हें उसमें आनन्द आवेगा, झूठ बोलेंगे तो उसमें हर्षोत्फुल्ल रहेंगे, चोरी करेंगे तो उसे करते समय बड़े प्रसन्न होंगे, कुशील-प्रवृत्तिमें भी संतोषकी सांस लेंगे और परिग्रह-संचयमें भी आनन्दित रहेंगे। इस प्रकार पापकी प्रत्येक क्रियामें इन्हें आनन्द ही आनन्द मिलता है ।
प्राचीन महर्षियोंने ऐसे व्यक्तियोंका हिंसानन्दी, मृषानन्दी, चौर्यानन्दी, अब्रह्मानन्दी और परिग्रहानन्दी नामसे उल्लेख किया है। यह वह स्थिति है जब मनुष्य पापको पाप नहीं समझता है और पाप करते समय उसे रस आने लगता है। इस प्रकारके व्यक्ति दो श्रेणियोंमें विभक्त किये जा सकते हैं। एक वे हैं जिन्हें पाप-पुण्यका कोई विवेक नहीं है और पाप-क्रियामें उन्हें रस आता है और दूसरे वे हैं जिन्हें पाप-पुण्यका विवेक है, फिर भी पाप-प्रवृत्तिका रस उन्हें पागल किये रहता है। दोनों ही अज्ञानी हैं। अन्तर इतना है कि एकको पाप-पुण्यका कोई विवेक नहीं और दूसरा पाप को पाप समझकर भी अपनी तृषासे पापकी धारामें बहा जा रहा है। उन्हें अपन पतनकी पराकाष्ठाका कोई ध्यान नहीं। उन्हें पता ही नहीं कि इस पाप-बीजका वपन करके वे किस विव-वृक्षका अंकुरारोपण करने जा रहे हैं और उसके फलोंके रसास्वादसे उनकी कितनी भयंकर दुर्गति हो सकती है।
अज्ञानी पाप-धतूरा न बोय ।
अरे अज्ञानी, पापरूपी धतूरा न बो । रे मूढ़ मानव, पापरूपी धतूराको बोते समय तो तुझे कुछ नहीं होगा, परन्तु फल चखन के समय तू फूट-फूट कर रोवेगा और जान तक खो देगा । अरे अज्ञानी, पापरूपी धतूरा न बो ।
किंचित् विषयनिके सुख कारण, दुर्लभ देह न खोय ।
अरे अज्ञानी, क्या तुझे मालूम नहीं है कि यह पञ्चेन्द्रिय सम्बन्धी वासनाएँ क्षणिक सुखकी कारण हैं। इनसे कदापि शाश्वत सुख प्राप्त नहीं किया जा सकता। फिर इन क्षणिक सुख देनेवाली विषय-वासनाओंके पीछे तू दुर्लभ मानव-पर्याय क्यों व्यर्थ खोये दे रहा है? रे मानव, तू यह खूब समझ ले कि इस मनुष्यपर्यायकी प्राप्तिका अवसर फिर तुझे कभी नहीं मिलनेवाला है। इसलिए छोड़ यह मोह-निद्रा और सजग होकर कर ले कुछ आत्म-हित-साधन । अरे अज्ञानी, पापरूपी धतूरा न बो ।
इस बिरियांम धर्म-कल्प-तरु, सींचत स्यानै लोय ।
अरे मूढ़, यह वह समय है जब सभी विवेकशील मानव धर्म-कल्पतरु
का सिंचन करते हैं और अपने अजरामर पदकी प्राप्तिके लिए दृढ़ताके साथ यत्नशील रहते हैं। और मानव, इस ही पुण्य-वेलामें तू विष-बीज बो रहा है ! सोच, तुझ-जैसा अभागा भी कोई संसारमें होगा ?
अरे अज्ञानी, पापरूपी धतूरा न बो ।
कवि अन्तम बतलाते हैं कि मानव, तेरी समस्त यातनाएँ और उत्पीड़ाएँ पूर्व जन्ममें तेरे बोये गये विष-बीजके ही परिणाम हैं और तू यह समझ-बूझ कर भी फिर विष-बीज ही बोय जा रहा है? कविकी बात सुनिएः-“जे जगमें दुखदायक बेरस, इसहीके फल सोय । यों मन ‘भूधर’ जानिकै भाई, फिर क्यों भोंदू होय ।। अज्ञानी पाप-धतूरा न बोय ॥” अरे अज्ञानी, संसारम प्राणियोंकी दुखद और रसहीन जितनी प्रवृत्तियां हैं वे सब इसी पापरूपी विव-बीजके परिणाम हैं। रे मानव, यह सब जानकर भी तू क्यों अनजान बन रहा है ? रे अज्ञानी, तू पाप-रूपी धतूरा न बो ।
स्रोत: अध्यात्म पदावली।
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