आत्म चिन्तन का ये समय | Aatm chintan ka ye samay

आत्म चिंतन का ये समय आया।
पाके नरतन क्या खोया क्या पाया॥टेक॥

हम जिसे ज्ञान-ज्ञान कहते हैं।
मन तो इन्द्रियों में है भरमाया॥१॥

देखो पर्याय तो है क्षणभंगुर।
फिर भी पर्यायों में तू इतराया॥२॥

तू तो टंकोत्कीर्ण ज्ञायक है।
बस यही तू समझ नहीं पाया॥३॥

एक क्षण निज में अब ठहर जाओ।
बस यही आख़री समय आया॥४॥


स्रोत: मङ्गल भक्ति सुमन (२०२४), पृष्ठ १९८

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