ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला है, ये तीरथ हमारा।
प्राणों से भी प्यारा है, ये तीरथ हमारा ॥ टेक ॥
भावों से हम करें वंदना, मन में कोई नहीं कामना।
वैराग्य बढ़ावनहारा है, ये तीरथ हमारा ॥ 1 ॥
हिल-मिल कर हम भक्ति रचावें, ज्ञान बढ़ावें मोह मिटावें।
प्रेम बढ़ावनहारा है, ये तीरथ हमारा ॥ 2 ॥
सर्व प्रपंचों को हम छोड़ें, निज उपयोग सु निज में जोड़ें।
बंध नशावन हारा है, ये तीरथ हमारा ॥ ३॥
अपने में सिद्धत्व निहारें, सब को आप समान विचारें।
महानंद बढ़ावनहारा है, ये तीरथ हमारा ॥ 4 ॥
ज्ञान बढ़ावनहारा है ये तीरथ हमारा,
धर्म बढ़ावनहारा है ये तीरथ हमारा।
ऊँचे-ऊँचे शिखरों वाला है ये तीरथ हमारा ॥ 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’