आतमज्ञान लखैं सुख होइ | Aatamagyan Lakhain Sukh Hoi

आतमज्ञान लखैं सुख होइ

आतमज्ञान लखैं सुख होइ ॥टेक॥
पंचेन्द्री सुख मानत भोंदू, यामें सुख को लेश न कोइ ॥

जैसे खाज खुजावत मीठी, पीछैं तैं दुखतैं दे रोइ ।
रुधिरपान करि जोंक सुखी है, सूँतत बहुदुख पावै सोई ॥
आतमज्ञान लखैं सुख होइ ॥1॥

फरस-दन्तिरस-मीनगंध-अलि, रूप-शलभमृग-नाद हिलोइ ।
एक एक इन्द्रनितैं प्राणी, दुखिया भये गये तन खोइ ॥
आतमज्ञान लखैं सुख होइ ॥२॥

जैसे कूकर हाड़ चचौरै, त्यों विषयी नर भोगै भोइ ।
‘द्यानत’ देखो राज त्यागि नृप, वन वसि सहैं परीषह जोइ ॥
आतमज्ञान लखैं सुख होइ ॥3॥


Artist: पं. द्यानतराय जी
स्रोत: nikkyjain.github.io (पं द्यानतराय कृत भजन)

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