अखिल विश्व में मुझको, केवल आत्म स्वरूप दिखाय रे
अखिल विश्व में मुझको, केवल आत्म स्वरूप दिखाय रे ।
स्वांग न दीखे, भेद न दीखे द्वैत नहीं दिखलाय रे ।।
वचनातीत विकल्प अगोकचर, परमानंद उपजाय रे ।।टेक।।
जिल मुद्रा में जिन मंदिर में, जिन तीरथ में, जिनवाणी में ।
आत्म स्वरूप दिखाय रे ।।1।।
दशलक्षण में, रत्नत्रय में, धर्मध्यान में, शुक्ल ध्यान में ।
आत्म स्वरूप दिखाय रे ।।2।।
एकेन्द्रिय में, पंचेन्द्रिय में, वहिरातम में परमातम में ।
आत्म स्वरूप दिखाय रे ।।3।।
गुणस्थानों में, नव तत्त्वों में, साधक में, और सिद्ध दशा में ।
आत्म स्वरूप दिखाय रे ।।4।।
भिन्न स्वरूप दिखाय रे, पूर्ण स्वरूप दिखाय रे ।
ध्येय स्वरूप दिखाय रे, ज्ञायक रूप दिखाय रे ।।
ज्ञान स्वरूप दिखाय रे, ज्ञेय स्वरूप जनाय रे ।
सहज स्वरूप दिखाय रे, ज्ञानानंद उछलाय रे ।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ १२०