अनाहारी भगवान् शुद्ध आत्मा,
आहार करता नहीं प्रभु कहा ।
सहज आनन्द का धाम शुद्धात्मा,
पूर्ण रहता स्वयं में स्वयं ही सदा ।।टेक।।
आत्मा तो सदा तृप्त स्व भाव से,
नहिं परभाव को ग्रहण करता कदा ।
नित्य निष्कर्म निष्क्रिय ज्ञायक प्रभु,
विदेही है नहीं देह धरता कदा ।।1।।
देह जिसके नहीं कर्म जिसके नहीं,
राग जिसके नहीं कैसे आहार हो ।
वीर्य अन्तर उछलता अनन्त अहो,
ज्ञान-आनन्दमय तृप्त जीवन सदा ।।2।।
धन्य हैं आत्मज्ञानी जगत् में अहो,
तुष्ट निज में सहज शान्त कृतकृत्य हैं ।
जीवन परमार्थमय जिनका आदर्श है,
जुड़ती आहार में वृत्ति नहीं कदा ।।3।।
दूर आहार, आहार के भाव के,
होवे कर्ता हनीं बनते ज्ञाता नहीं ।
सहज निरपेक्ष ज्ञाता वे ज्ञाता ही हैं,
सिद्ध भगवन्त सम ज्ञाता रहते सदा ।।4।।
वृत्ति आहार की होती जो दु:खमय,
तास के नाशने को उपाय यही ।
द्रव्यदृश्टि धरो अनुभवन रस पियो,
ध्याओ भगवान् अनाहारी आत्मा सदा ।।5।।
स्रोत: जिनवाणी भक्ति, पृष्ठ ९७ से ९८