तर्ज : मंगल अवसर आज सुरगण आये…
आया रे अवसर महान्, आओ जिनवाणी सुनें।
जिनवाणी सुनें, आत्मज्ञानी बनें ।। टेक।।
जिनवाणी अमृत भरी, करे सर्व कल्याण।
मोह महातम नाश कर, प्रगटावे निज ज्ञान।। 1।।
नव तत्त्वों से भिन्न निज, आत्म तत्त्व दरशाय।
निर्विकल्प चैतन्यमय उपादेय सुखदाय ।। 2।।
निज आतम के ज्ञान बिन, घूमे सकल जहान।
निज आतम के ध्यान से, पावें पद निर्वाण।। 3।।
धन्य-धन्य हमको मिला, परम धर्म उपदेश।
परमानन्द निज में लह्यो, नाशें सर्व क्लेश।। 4।।
धरि निर्ग्रन्थ स्वरूप प्रभु, ध्याऊँ आतमराम।
यही भावना हो रही, रहूँ सदा निष्काम ।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ १५१ से १५२
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’