हे भव्यजीव ! अपनी आत्मा को जानो, पहचानो, समझो । जो सदैव जीवन की कामना करता है, कभी मृत्यु की माँग नहीं करता, दुःख को टालकर, छोड़कर सदैव सुख चाहता है, जो ऐसा चाहता है वह ही जीव है यह जाना जाता है।
नैन बैनमें कौन है, कौन सुनत है बात। (प्राणी!)
आँखों से कौन देखता है, वचन से कौन बोलता है, कानों से बात कौन सुनता है? यह जान! अरे, जो देखता है, बोलता है, सुनता है वही आत्मा है, वही चेतनस्वरूप है, उसे जान। वह तेरे भीतर ही है। तू अपने आप में अपने चेतन स्वरूप को क्यों नहीं निहारता? क्यों नहीं देखता ? जिसकी जाति ही चेतन है!
बाहिर ढूंढ़ें दूर है, अंतर निपट नजीक । (प्राणी!)
तू उसे बाहिर ढूँढ़ता है, जहाँ से वह बहुत दूर है जबकि वह तो सदा तेरे बिल्कुल निकट है, पूर्णतः समीप है। अरे यह ढूँढ़नेवाला कौन है? तू उसे ही भलों प्रकार जान ले, वह ही आत्मा है।
तीन भुवनमें देखिया, आतम सम नहिं कोय। (प्राणी!)
तीन लोक में अच्छी तरह देख ले, आत्मा के समान अन्य कोई तत्त्व/द्रव्य/पदार्थ नहीं है। द्यानतराय कहते हैं कि जो आत्मा का अनुभव करते हैं, उन्हें शिवसुख अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।