आचार्य कुन्दकुन्द हैं आदर्श हमारे | acharya kundakunda haim adarsha hamare

आचार्य कुन्दकुन्द हैं आदर्श हमारे,

आदर्श हमारे सर्वस्व हमारे ।। टेक।।

शुद्धात्मा दर्शाय दिया सहज ज्ञानमय,
आराधना सहज करूँ होकर निर्भय।
आत्मा परमात्मा में दीखे न अंतर,
ध्येय रूप ध्यान माँहि वर्ते निरन्तर ।। 1।।

निस्पृह एकाकी हो निर्ग्रन्थ रहाऊँ,
निःशल्य निर्द्वन्द्व चिद्रूप भाऊँ ।
कुछ भी प्रयोजन पर से नहीं रे,
मेरा तो सर्वस्व मुझमें दिखे रे।। 2।।

तृप्त हुआ कृतकृत्य हुआ रे,
आनंदमय सहज जीवन हुआ रे।
शब्दों से उपकार कैसे कहूँ मैं,
भाव सहित नित नमन करूँ मैं ।। 3।।

ब्रह्म स्वरूप ही अपना दिखे रे,
ब्रह्म स्वरूप ही गुरुवर दिखे रे।
ब्रह्म स्वरूप में मग्न रहूँ रे,
ब्रह्म स्वरूप ही नमन करूँ रे ।। 4।।


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु, पृष्ठ २४६ से २४७
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’