अब जिनदीक्षा लेना चाहिए, निज आराधन करना चाहिए ।।टेक।।
जीवन का है नहीं ठिकाना, यहाँ से कब हो जावे जाना।
अब विलम्ब नहीं करना चाहिए।। अब … ।।1।।
है स्वाधीन सु बाह्य व्यवस्था, कर्मोदय की अति विचित्रता।
लखकर समता धरना चाहिए।। अब … ।। 2।।
जीव स्वयं ही सुख-दुःख भरता, कोई किसी का कुछ नहीं करता।
ज्ञाता-दृष्टा रहना चाहिए।। अब … ।। 3।।
सुख का कारण नहीं परिग्रह, परिग्रह से तो होते विग्रह।
अब निर्ग्रन्थ सु-रहना चाहिए।। अब … ।। 4।।
मिथ्या पर में निज संकल्प, अरे निरर्थक सर्व विकल्प।
नित निर्द्वन्द्व सु-रहना चाहिए।। अब … ।। 5।।
इच्छाओं की पूर्ति असम्भव, अक्षय सुख निज में ही सम्भव।
निर्वांछक ही रहना चाहिए।। अब … ।। 6।।
त्याग कुसंग महादु:खकारी, होवें निश्चय शिवमगचारी।
सहज असंग ही रहना चाहिए।। अब … ।। 7।।
सब प्रकार अवसर है आया, मन में यही भाव उमगाया।
सहज समाधि धरना चाहिए।। अब … ।। 8।।
Artist:- आ.बा.ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’
स्रोत: जिन-भक्ति सिंधु, पृष्ठ २३४ से २३५